आलू राजा

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

पर्यावरण सुरक्षा में जन भागीदारी

विश्व पृथ्वी दिवस की शुभकामनाएं!

प्रकृति और पृथ्वी अपना संतुलन बनाती रहती है। जब प्रकृति को यह महसूस होता है कि मनुष्य उसका संतुलन बिगाड़ रहा है तब किसी ना किसी माध्यम से वह संतुलन को बनाने का प्रयत्न करती है मेरी इस बात से आप असहमत हो सकते हैं लेकिन कोरोना के विषय में भी प्राकृतिक संतुलन के सिद्धांत को नकारा नहीं जा सकता।  पिछले कई वर्षों से अंधाधुंध प्रकृति का दोहन और पृथ्वी का शोषण हो रहा है। विकास के नाम पर वृक्षों को काटकर चौड़ी चौड़ी सड़क और ऊंची ऊंची बिल्डिंग बनाई जा रही है। कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक गुजरात से लेकर असम अरुणाचल प्रदेश तक हर जगह यही हाल है। पृथ्वी को जब यह महसूस होता है,  कि मनुष्य उसका संतुलन बिगड़ रहा है तब वह कभी सुनामी,  केदारनाथ जैसी आपदा ,भूकंप के माध्यम से वह अपना संतुलन बनाने का प्रयत्न करती है ।
बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध में पर्यावरण प्रदूषण की समस्या ने नए आयाम प्राप्त कर लिए ।भोपाल गैस दुर्घटना 1984 चेरनोबिल दुर्घटना 1986 और विश्व के अनेक देशों में अकाल की विभीषिका इस प्रवृत्ति के नमूने के रूप में लिए जा सकते हैं अमेरिकी प्रतिष्ठान यूनियन कार्बाइड के भोपाल स्थित कारखाने में गैस रिसाव के कारण हजारों लोगों की जानें गईं और अनेक लोग विकलांग हो गये।  भूतपूर्व सोवियत संघ के चेर्नोबिल परमाणु बिजली घर में दुर्घटना के कारण उत्पन्न  विषाक्त विकरण न केवल वायुमंडल को व्यापक पैमाने पर प्रदूषित किया व आसपास के क्षेत्रों को भी पर्याप्त मात्रा में विषाक्त कर दिय। चेरनोबिल की दुर्घटना के चलते ऐसा कहा जाता है कि यूरोप के अनेक देशों स्वीडन, फिनलैंड ,इंग्लैंड जर्मनी आदमी रेडियोधर्मिता के प्रसार के कारण खेत बाग एवं चारागाह प्राप्त हो गए परमाणु विकिरण के इस भयानक खतरे को देखते हुए जापान चीन और अमेरिका के 200 परमाणु बंद कर दिया गया।
 हमारा समाज आज भी पर्यावरण के संकट से जूझ रहा है। 'माता भूमि पुत्रो अहं पृथिव्या' कहकर भू संरक्षण का संदेश देने वाले समाज के सामने पर्यावरण सुरक्षा के प्रश्न उठ खड़े हुए हैं? परि तथा आवरण के योग से निस्पंन पर्यावरण का शब्दकोशीय अर्थ होता है- आसपास मानव जंतुओं या पेड़ पौधों की वृद्धि एवं विकास को प्रभावित करने वाली बाह्य दशाएं, कार्यप्रणाली तथा जीवन यापन की दशाएं।प्राचीन काल से ही हमारा समाज पर्यावरण के कल्याण के प्रति जागरूक रहा है। वैदिक युग में हमने वेदों में यह तथ्य दिए कि हम अपनी सृष्टि को अधिक समय तक बनाए रखने के लिए इसका उपयोग करें, न कि उपभोग।
 हमारे पूर्वज जानते थे कि मनुष्य इंद्रियों का दास है तथा आगे आने वाले समय में वह इंद्रिय सुख के लिए सर्वस्व नष्ट करने के लिए तैयार हो सकता है इसलिए उन्होंने संपूर्ण मानव समुदाय के लिए कुछ नियम विचार और सिद्धांत दिए। वे जानते थे कि मानव की अधिनायक वादी सोच के कारण वह सर्वप्रथम पर्यावरण पर आधिपत्य करेगा। पूर्वजों ने प्रत्येक पर्यावरणीय अंग के साथ दैवीय शब्द जोड़ दिया ताकि मनुष्य आध्यात्मिक लाभ की प्राप्ति के लिए ही सही कम से कम पर्यावरण की रक्षा तो करेगा। पीपल ,बरगद, तुलसी ,नीम, वृक्षों को जन सहयोग के माध्यम से संरक्षित करने का प्रयास उसी युग में प्रारंभ हो गया था।फिर जीव जंतुओं को संरक्षित करने का प्रयत्न आध्यात्मिक रूप से किया गया तो शिव के श्रृंगार का साधन सांप ,कृष्ण के श्रंगार में मोर पंख का प्रयोग किया गया। इसी तरह किसी न किसी पशु को किसी न किसी देवता के वाहन बनाकर उसकी रक्षा का आध्यात्मिक प्रयास प्रारंभ हुआ परंतु जो लोग पीपल, बरगद, तुलसी ,सांप ,मोर, गाय में अपने देश के दर्शन करते थे आज वही लोग इन सब देवों के सामूहिक रूप पर्यावरण के दुश्मन कैसे हो गए इन सब के पीछे दृष्टिपात करें तो पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव का पता चलता है। आज पूरी दुनिया पर्यावरण संकट से जूझ रही है।भोगवादी संस्कृति का प्रभाव ऐसा हुआ है स्थित भयानक हो गई है और लोगों ने इसके कारणों को खोजना प्रारंभ किया। 1927 में वैज्ञानिकों ने हरित ग्रह प्रभाव की खोज की लेकिन तब तक पर्यावरण अपना बदला लेना प्रारंभ कर दिया कुछ ऐसी आपदाएं जिससे संपूर्ण विश्व पर्यावरण सुरक्षा में अपनी भागीदारी देने के लिए खड़ा हुआ ।उन घटनाओं में 1972 की स्वीडन की अम्लीय वर्षा, 1984 का भोपाल गैस कांड, 1985 में ओजोन परत में छिद्र, 1986 में चेर्नोबिल काण्ड प्रमुख हैं। इसके अलावा जल ध्वनि, वायु आदि प्रदूषण से पर्यावरण की सुरक्षा करने का प्रश्न संपूर्ण समाज के सामने खड़ा हुआ ।भोग वादी संस्कृति के कारण जनसंख्या विस्फोट मशीनीकरण का अत्यधिक उपयोग तथा तकनीकी के अप्रत्याशित प्रसार ने पर्यावरण को नष्ट करने का प्रयास किया इससे धरती का तापमान बढ़ा और मधुमक्खी गौरैया, तितली आदि छोटे जीव जंतु समाप्ति के कगार पर आ गए।
 इन समस्याओं को सुलझाने के उद्देश्य से जन भागीदारी का प्रारंभ हुआ। भारत में 1927 में वनों को बचाने के लिए भारतीय वन अधिनियम लाया गया। उसके बाद पर्यावरण सुरक्षा पर राष्ट्रीय तथा अंतरराष्ट्रीय स्तर के अनेक कार्यक्रम शुरू हुए जिनमें 1972 में विश्व पर्यावरण सम्मेलन( स्टॉकहोम), वन्य जीव संरक्षण अधिनियम (भारत),1973 में वृक्षों को बचाने के लिए भारत में चिपको आंदोलन,
1992 में पृथ्वी सम्मेलन, 1995 में राष्ट्रीय पर्यावरण ट्रिब्यूनल एक्ट, 1997 में क्योटो सम्मेलन, 2002 में विश्व पृथ्वी सम्मेलन,और 16 फरवरी 2005 को प्रभावी हुआ क्यूटो प्रोटोकॉल प्रमुख है।

कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रयासों के बाद भी पर्यावरण संकट का ठोस हल न निकलता नहीं दिख रहा है इसके पीछे प्रमुख कारण जनभागीदारी का ना होना है ।किसी भी परिवर्तन में जनभागीदारी का सर्वाधिक महत्व होता है। इन सभी कार्यक्रमों में जन सहयोग द्वारा हम पर्यावरण को सुरक्षित कर सकते हैं तथा इन सब के अलावा व्यक्तिगत रूप से भी जनभागीदारी हो सकती है। इसके कुछ प्रमुख उदाहरण हैं।
जल संरक्षण, ध्वनि नियंत्रण, वन्य जीव संरक्षण, वन संरक्षण पौधारोपण, पशुओं का गोबर तथा अन्य अपशिष्ट के माध्यम से हम पर्यावरण संरक्षण में अपना योगदान दे सकते हैं। हमें अपने जीवन में कम से कम एक वृक्षारोपण कर उसको पल्लवित और पुष्पित अवश्य करना चाहिए ।मानव जाति से इस सृष्टि में सह अस्तित्व की भावना शुरू से ही रही है लेकिन जब इस भावना में अंतर आया तब पर्यावरण संकट छाने लगा इस संकट को दूर करते हुए पशु-पक्षियों जीव जंतुओं सबका सहयोग करने के लिए सह अस्तित्व की भावना से रहना होगा। पर्यावरण सुरक्षा में प्रत्यक्ष जनभागीदारी के सफल क्रियान्वयन के लिए कुछ ग्राम वासियों की वन समिति बनाई जा सकती हैं जो पर्यावरण के लिए कार्यक्रमों को जन जागरण का काम सौंपा जाए। दीवार पर पर्यावरण जागरूकता संबंधी विभिन्न प्रकार के स्लोगन, शादी विवाह के अवसर पर कन्यादान के साथ वृक्ष दान, बच्चे के जन्म के साथ वृक्षारोपण,वृक्ष महोत्सव जैसे कार्यक्रम वन समितियों द्वारा संपन्न कराए जाएं।
अंत में हमें इस विषय को गंभीरता से सोचना होगा कि आज कोरोना जैसी जो भयानक बीमारी इस समाज में व्याप्त हुई है यह केवल लैब से निकली हुई या यूं ही यह बीमारी किसी वायरस से नहीं फैल रही है। कहीं ना कहीं इसके पीछे प्राकृतिक असंतुलन भी है हमें इन सभी बातों को गंभीरता से सोचना पड़ेगा और प्राकृतिक असंतुलन को मिटाने के लिए हमें  'नित्य नूतन, चिर पुरातन' सूक्ति का अनुसरण करना पड़ेगा।

दीपक तिवारी'दिव्य'


रविवार, 15 अप्रैल 2018

जल समस्या : संरक्षण ही हल

बिन पानी सब सून
प्रकृति और प्राणी एक दूसरे के पूरक हैं।प्रकृति प्राणियों की आवश्यकताओं की पूर्ति करती है और प्राणी प्रकृति को पूज्यनीय मानकर उसको पल्लवित करते हुए त्याग पूर्वक भोग करता रहा है।प्रकृति ने हमे जल के रूप में अपना सर्वश्रेष्ठ उपहार प्रदान किया है।प्रकृति यह जानती थी कि मनुष्यों को जीवन यापन के लिए जल की  अत्यधिक  आवश्यकता है और रहेगी इसलिए उसने पानी के असीम श्रोत बनाए।केवल उसने धरती के नीचे ही नहीं अपितु ऊपर से वर्षा के रूप में जल उपलब्ध कराने की व्यवस्था दी।
लेकिन मनुष्य ने प्रकृति द्वारा प्रदत्त संसाधनों का ऐसा दुरपयोग किया कि आज लातूर और बुन्देलखण्ड का उदाहरण हम सबके सामने है।आज संपूर्ण विश्व में जल की कमी के कारण त्राहि त्राहि है।इसी आने बाले जल संकट को  हमारे  महापुरुषों ने कई सदियों पहले पहचान लिया था और कहा था "रहिमन पानी राखिए बिन पानी सब सून" ।
मानसून में देरी , ग्लोबल वार्मिंग , एवं जल के अनावश्यक दोहन के कारण भूजल स्तर में बहुत कमी आ गई है।पानी के कारण झगड़े उत्पन्न हो रहे हैं और उनसे लोगों की मृत्यु हो रही है।निर्गुण भक्ति धारा के कवि संत कबीर ने सदियों पहले कहा था "पानी बिन मीन प्यासी , मोहे सुन आबत हासी।"उस समय ये हँसने का विषय रहा होगा लेकिन आज इस विषय ने व्यक्ति के अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है।पर्यावरण के बचाव में योगदान करने वाली संस्था इंटरगवर्नमेंटल पेनल ऑन क्लाइमेट चैंज के अध्यक्ष एवं नोबेल पुरस्कार से सम्मानित डॉ राजेन्द्र पचौरी ने चेतावनी दी थी कि भारत समेत कई देशों की कृषि पैदावार जलवायु परिवर्तन के कारण बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है।ग्लोबल वार्मिंग के कारण तेजी से पिघलते हिम ग्लेशियर ने भी जल संकट को और बढ़ा दिया है।जिस पानी को लेकर सारी दुनिया सूखती जा रही है वहीं भारत में आम लोग जल संरक्षण के विषय पर गंभीर नहीं हैं।आम जनमानस के साथ सरकार को भी अपने दृष्टिकोंण में बदलाव लाना होगा।
भारत में हालात बहुत चिंताजनक हैं केंद्रीय भूजल बोर्ड के एक अनुमान के अनुसार अगर भूमिगत जल का अंधाधुंध प्रयोग का सिलसिला जारी रहा तो देश के 15 राज्यों में भूमिगत जल के भंडार 2025 तक पूरी तरह खाली हो जाएँगे।वर्षा जल के संग्रह के अभाव , अवै ज्ञानिक तरीकों से पानी का उपयोग तथा वर्षा की असमानता आदि कारणों से देश में प्रतिवर्ष कहीं न कहीं सूखे की स्थिति बनी रहती है।
भूमिगत जल के अवैज्यानिक और अंधाधुंध उपयोग से भी जल संकट गहरा रहा है।तेजी से हो रहे जल दोहन से मानव को केवल जल संकट का ही ख़तरा नहीं है अपितु मानव को शुद्ध पानी मिल जाए ये भी एक चुनौती हो गई है।दुनिया में 50 लाख लोग दूषित जल के कारण पैदा होने बाली बीमारियों से मर जाते हैं।यह संख्या विभिन्न युद्ध में मारे जाने वाले लोगों से 10 गुना अधिक है।प्रतिवर्ष 15 लाख बच्चे जल जनित बीमारियों की चपेट में आकर काल के गाल में समा जाते हैं।आज देश के कई हिस्सों में भूमिगत जल विकलांग बनाने बाले फ्लोराइड की अधिकता के चलते पीने योग्य नहीं रहा।जल जनित बीमारियों से प्रतिवर्ष लाखों लोग मृत्यु के मुँह में समा रहे हैं।इनमें से इधिकांश विकासशील देश के हैं।भारत में प्रतिदिन 16000 मौतें दूषित पेयजल के कारण उत्पन्न हुई बीमारियों से हो रहीं हैं।
हमारे देश में वर्षा के रूप में काफ़ी मात्रा जल प्राप्त हो जाता है लेकिन उसका बड़ा हिस्सा विभिन्न नदियों के जरिए समुद्र में व्यर्थ चला जाता है।आज आवश्यकता है कि वर्षा का जल संरक्षित किया जाए।वर्षा के जल  को हम अपने घर की छत पर या घर के नीचे संरक्षित कर सकते हैं।विश्वभर में प्रत्येक वर्ष 160 क्यूबिक किलोलीटर मात्रा में भूमिगत जल निकाला जाता है और इसकी भरपाई नहीं हो पाती ।पॅछले 50 वर्षों में प्रतिव्यक्ति पानी की उपलब्धता तेजी से घट रही है।जो सन 1951 में 5200 घन लीटर की तुलना में सन 2001 में केवल 1800 घन लीटर ही रह गई और यदि समय रहते ज़रूरी उपाय नहीं किए गए तो 2050 तक पानी की प्रतिव्यक्ति उपलब्धता 1140 घन लीटर ही रह जाएगी।
भूमिगत जल राष्ट्र की सम्पत्ति है तथा इस संपत्ति का उपयोग संयमित और सुनियोजित मात्रा में ही होना चाहिए।आज आवश्यकता है कि महानगरों और कस्वों में वाटर हार्वेस्टिंग का प्रयोग करके मकानों की छतों पर पानी को रोका जाए और उस पानी का सदुपयोग किया जाए।घरेलू कार्यों जैसे नहाने , सब्जी धोने,घर धुलने , कुत्ते तथा पालतू जानवर को  नहलाने , गाड़ी धोने कपड़े धोने आदि में जल का प्रयोग कम से कम मात्रा में करना चाहिए।पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव में अपने जीवन को विलासता पूर्ण बनाने के लिए स्वमिंग पुल , वाटर पार्क , पार्क आदि जल दोहन के केंद्र बनते जा रहे हैं।घर पर जो व्यक्ति एक वाल्टी पानी से नहा लेता है वहीं  स्विमिंग पुल वाटर पार्क में हज़ारों लीटर  पानी व्यर्थ करता है।घरों में सवमर्सिवल लगानें को लोग अधिक महत्व दे रहे हैं।सरकार को परिवार के सदस्यों के आधार पर समर का कनैक्शन देना चाहिए।
जब यह जल संकट अत्यधिक बढ़ जाएगा तो सरकारों के इसके निजीकरण पर विचार करना होगा।बोलीविया का जल युद्ध हमें जल संकटों पर गंभीरता से सोचने के लिए प्रेरित करता है।इस धरती पर जीवन जल के ही कारण है इसलिए पानी की एक एक बूंद के महत्व को समझते हुए हमें जल संरक्षण के प्रति जागरूक होकर पानी के बचाव के लिए उचित प्रयास करने होंगे। 

दीपक तिवारी 'दिव्य'

मंगलवार, 7 जून 2016

सर्व समाज के मसीहा : आंबेडकर

दलितों के नहीं सर्व समाज के मसीहा थे अंबेडकर

पिछले कुछ समय से राष्ट्रवाद और राष्ट्रनायकों के विकेन्द्रीयकरण का दौर प्रारंभ हुआ है।तकनीकि के युग के प्रारंभ होने के बाद और जातिगत राजनीति के उदय के पश्चात् चतुर राजनेताओं द्वारा नायकों का पेटेंट करते हुए इन्हें संकुचित बनाकर केवल एक उस विशेष जाति जिससे वो संबंधित हैं तक सीमित करने का प्रयास किया जा रहा है।
सोशल मीडिया पर उस नायक से संबंधित झूठी तथ्य हीन बातें तथा उस नायक की जाति को बरगलाने का क्रम ज़ोर - शोर से जारी है।ऐसे लोगों की सोच केवल यही है कि समाज को किसी भी तरह एक न होने दिया जाए और समाज को बाँटकर अपना हित साधते रहा जाए।
महानायकों को नायक तक सीमित रखने के क्रम में सबसे ज्वलंत उदाहरण यदि किसी का है तो वो हैं डॉ भीमराव आंबेडकर।आज़ादी के 65 वर्ष व्यतीत होने के बाद भी कुछ विशेष लोगों ने इस महानायक को केवल दलित नायक की छवि में बाँधकर रखा हुआ है।जबकि बाबा साहेब ने दलित ही नहीं सर्व समाज के उत्थान के लिए संघर्ष किया। 
डॉ अंबेडकर का जन्म 1891 में महू ( मध्य प्रदेश ) में हुआ था।इनके पिता का नाम रामजी सकपाल था।अंबेडकर के बचपन का नाम भीम था और सकपाल उपनाम।बाबा साहेब बचपन से ही मेधावी थे।समाज में उस समय जातिवाद हावी था इसलिए भीम राव के एक ब्राह्मण अध्यापक ने अपना अंबेडकर उपनाम भीम सकपाल को दिया ताकि यह होनहार बालक जातिवाद के कारण समाज में पिछड न जाए।इस प्रकार भीम सकपाल से बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर हो गए।
14 भाई बहनों में सबसे छोटे भीम मैट्रिक करने बाले महार जाति के पहले छात्र बने।भीम की अध्ययन में रुचि को देखते हुए इनके एक दूसरे अध्यापक कृष्णाजी केलुस्कर ने भीम को गौतम बुद्ध की जीवनी पढ़ने को दी तथा इन्हें बडौदा नरेश सियाजी राव गायकबाड के पास ले गए।
राजा साहब ने इस होनहार बालक का पूरा सहयोग किया और भीम राव को छात्रवृत्ति मिलने लगी।1912 में बंबई यूनीवर्सिटी से बीए करने बाद कोलम्बिया में उच्च शिक्षा हेतु प्रस्थान किया।अमेरिका में पढ़ाई कर रहे अंबेडकर को लाला लाजपत राय ने राजनीति में आने का आमंत्रण दिया।उस समय डॉ ने उनका आमंत्रण स्वीकार नहीं किया।अपनी पढ़ाई सम्पन्न करने के वाद डॉ आंबेडकर सैक्रेटरी ऑफ़ बडौदा स्टेट बन गए।
समाज की मुख्यधारा से कटे हुए लोगों का नेतृत्व करते हुए अंबेडकर ने समाज को एक नई दिशा दी।उन्होंने लोगों से स्वयं अपना भाग्य विधाता बनने को कहा।
3 मार्च 1933 को मुंबई के बधाई समारोह में आपने कहा था-
"आपके मेरे लिए मानपत्र के लिए धन्यवाद।यह मानपत्र मेरे कार्य और गुणों की श्रेष्ठतम बातों से परिपूर्ण है।इसका अर्थ यह है कि आप अपने जैसे सामान्य व्यक्ति का दैवीकरण कर रहे हैं किसी व्यक्ति को देवता का दर्जा देकर आप अपनी सुरक्षा और हल की जिम्मेदारी एक व्यक्ति के हाथ सौंप देते हैं।परिणाम स्वरूप आप निर्भरता की आदत पालकर अपने कर्तव्यों के प्रति तटस्थ हो जाते हैं।यदि आप ऐसी सोच का शिकार हो जाते हैं तो आपका भाग्य राष्ट्रीय धारा में बह रहे लकड़ी के टुकड़े से बढ़कर और कुछ नहीं होगा।आपके संघर्ष का परिणाम शून्य होकर रह जाएगा।"
बाबा साहेब हिन्दू धर्म की उस समय की कमियों को दूर करना चाहते थे।वे चाहते थे कि पूरा समाज चाहे वो सवर्ण हो या दलित सब मिलकर बिना भेदभाव के साथ रहें ताकि एक संगठित राष्ट्र का निर्माण हो सके।वे धर्म पर पूर्ण विश्वास रखते थे।बाबा साहेब ने कहा था जैसे मनुष्य नश्वर है उसी तरह विचार भी नश्वर हैं।जैसे एक पौधे को पानी की ज़रूरत होती है उसी तरह विचार को प्रचार - प्रसार की ज़रूरत होती है।नहीं तो दोनो मुरझाकर मर जाते हैं।
अंबेडकर धर्म द्वारा दलित और सवर्ण को जोडना चाहते थे । "गौतम बुद्ध और उनका धम्म" में वे लिखते हैं कि - "अकेले व्यक्ति को धर्म की आवश्यकता नहीं होती लेकिन जब दो व्यक्ति जुडते हैं तब परस्पर व्यवहार के लिए धर्म की आवश्यकता होती है।"
इसी प्रकार डॉ अंबेडकर ने उस समय समाज में महिलाओं की स्थिति पर गहन अध्ययन किया।उस काल में महिलाओं की स्थिति बहुत दयनीय थी।बाल विवाह , सती प्रथा,सम्पत्ति में अधिकार न मिलना , पुनर्विवाह न होना, बालिकाओं की शिक्षा पर ध्यान न देना आदि समस्याओं ने महिलाओं को समाज में सबसे दयनीय स्थिति में रखा था।डॉ अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल के माध्यम से महिलाओं के अधिकारों को कानूनी जामा पहनाने के लिए संघर्ष किया।अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल के मुख्य पाँच भागों विवाह,विवाह विच्छेद,विरासत, गुज़ारा भत्ता और दत्तक के माध्यम से महिलाओं के मूल अधिकारों के इन पहलुओं को कानूनी मान्यता के लिए समाज व नीति नियन्ताओं के सामने रखा।
बाबा साहेब जिस रूप में यह बिल पारित कराना चाहते थे उस रूप में नहीं हुआ।लेकिन हिन्दू स्त्री-पुरुष विवाह की आयु आदि मुद्दे आंशिक रूप से लागू हुए।और धीरे - धीरे स्वतंत्र कानून इस मुद्दे पर बनने लगे।आज महिलाओं को जो भी संवैधानिक अधिकार मिल रहे हैं उसका प्रारंभ डॉ अंबेडकर ने ही किया था।
राष्ट्र नायक आंबेडकर को समाज में समता स्थापित करने के लिए कई संघर्ष करने पड़े।इन संघर्ष और आंदोलनों का परिणाम कभी-कभी सकारात्मक नहीं रहा।1935 में कालाराम मंदिर आंदोलन में सफलता न मिल पाने के कारण बाबा साहेब ने घोषणा की कि "मैं हिन्दू नाम से जन्मा हूँ लेकिन हिन्दू के नाम से मरूँगा नहीं । " बाबा साहेब की इस घोषणा से पूरा देश स्तब्ध था।तब महात्मा गाँधी ने बाबा साहेब से वार्ता की और आंबेडकर ने गांधी जी को वचन दिया कि मैं हिन्दू धर्म छोड़ूँगा लेकिन उसका कम से कम नुकसान हो इसका ध्यान रखूँगा।14 अक्टूबर 1956 को लगभग 5 लाख अनुयायियों के साथ डॉ आंबेडकर ने बौद्ध धर्म की दीक्षा लेकर गांधी जी को दिए वचन को निभाया।
बाबा साहब दलितों को मुख्यधारा में लाकर सम्पूर्ण समाज को एक साथ मिलाकर एक संगठित राष्ट्र का निर्माण करना चाहते थे।उनका सामाजिक न्याय , सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का मूल तत्व ही तो है।आज़ादी के वाद बाबा साहेब द्वारा प्रदत्त आरक्षण की आड लेकर कुटिल लोगों ने समाज को कई भागों में बाँट दिया।डॉ आंबेडकर को दलित नेता के रूप में स्थापित करने का षड़यंत्र जारी है लेकिन हिन्दू कोड बिल और मतांतरण पर दिए गए वचन को पूर्ण करके बाबा साहेब ने ये सिद्ध किया कि वह भारत के श्रेष्ठ राष्ट्रवादी तथा सर्व समाज के मसीहा थे।
अगस्त 2012 में कुछ टीवी चैनलों द्वारा कराए गए ई-मतदान में डॉ आंबेडकर को महात्मा गांधी के वाद  सर्वश्रेष्ठ भारतीय चुना जाना और हमारे देश के सभी नेताओं में सबसे ज्यादा मूर्तियाँ बाबा साहेब की लगना इस बात का प्रमाण हैं कि वह एक महानायक हैं।

दीपक तिवारी